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दाऊद से भी ज़्यादा दमदार था मुंबई का ये बादशाह

वैसे तो अपने underworld डॉन  दाऊद इब्राहिम और हाजी अली मस्तान के बारे में सुना और पढ़ा होगा लेकिन एक और नाम है जो आज भी अंडरवर्ल्ड की दुनिया मे अदब से लिया जाता है.

बात है सन् 1940-1950 की जब मुंबई को बंबई कहा जाता था.मुंबई के पहले डॉन की बात होती है तो ज्यादातर लोगों के जहन में हाजी मस्तान का नाम आता है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि मुंबई का पहला डॉन अफगानिस्तान की वादियों से आया हुआ एक पठान अब्दुल करीम खान शेर खान था, 50 के दशक में बंबई का बच्चा-बच्चा शेर खान को जानता था.

7 फुट लंबा कद, गोरा रंग, हर वक्त पठानी सूट पहने वाला शेर खान पठान ही वो शख्स था, जिसने पहली बार बंबई को डॉन शब्द का मतलब बताया. वैसे तो अफगानिस्तान के कुनार प्रांत का रहने वाला शेर खान पैसा कमाने की उम्मीद लेकर बंबई पहुंचा था. लेकिन बंबई आने के बाद लाला दक्षिण बंबई में वो जुआ का अड्डा चलाने लगा.

जुए के काम के साथ ही वो जुवारियों को पैसे उधार भी देने लगा. पैसे के इसी लेन-देन के कारण करीम लाला का नाम शेर खान भी पड़ गया. करीम लाला और बंबई का दूसरा डॉन हाजी मस्तान दोनों में एक खासियत थी. दोनों दुश्मन से ज्यादा दोस्त बनाने में यकीन रखते थे.अब जब पुलिस रोज आती, तो लाला ने पुलिस से भी दोस्ती कर ली. अब लाला को रोकने वाला कोई नहीं था.
करीम लाला का आतंक मुंबई में सिर चढ़कर बोलता था. मुंबई में तस्करी समते कई गैर कानूनी धंधों में उसके नाम की तूती बोलती थी. बताया जाता है कि वह ज़रूरतमंदों और गरीबों की मदद भी करता था.

अमिताभ बच्चन की यादगार फिल्म ‘जंजीर’ में शेर खान वाला किरदार करीम लाला से प्रभावित था.
7 फुट लंबा कद, गोरा रंग, हर वक्त पठानी सूट पहने वाला शेर खान पठान ही वो शख्स था, जिसने पहली बार बंबई को डॉन शब्द का मतलब बताया. मूल रूप से अफगानिस्तान के कुनार प्रांत का रहने वाला शेर खान पैसा कमाने की आशंकाओं को तलाशता हुआ भारत और फिर बंबई आ पहुंचा था.

ऐसे में शेर खान कहां से आया, ये सब को पता था, लेकिन बंबई कब आया, इसका कोई प्रमाण ठीक से साबित नहीं कर पाता. बंबई आने के बाद अपने शुरुआती दिनों में लाला ने दक्षिण बंबई के ग्राट ट्रंक रोड रेलवे स्टेशन के पास ही एक जगह किराए पर ली, जहां वो जुआ का अड्डा चलाता था.
जुए के काम के साथ ही वो जुवारियों को पैसे उधार भी देने लगा. पैसे के इसी लेन-देन के कारण शेर खान का नाम करीम लाला पड़ गया था.

इस तरह धीरे धीरे कुछ ही समय में करीम लाला का जुए का अड्डा अपराधों का अड्डा बन गया. करीम ने पुलिस से भी काफी नज़दीकियां बनाई रखीं थी. हालांकि लाला ये सब कुछ नहीं करना चाहता था, उसका सपना तो कुछ और ही था. लाला तो पूरी बंबई पर राज करना चाहता था.
इसके लिए लाला ने तस्करी का दामन थाम लिया. 40 के दशक के अंत तक हीरे और सोने की तस्करी में लाला ने अपने पैर जमा लिए. जब तस्करी के धंधे से पैसा आने लगा तो लाला ने बंबई में जुए औऱ शराब के और कई अड्डे खोल दिए.

शेर खान पठान जिसे लोग करीम लाला कहते थे, उसे बंबई के लोग अब किंग मानने लगे थे. वो दौर ऐसा था कि करीम के आदमीयों को कोई भी काम करवाने में बल का प्रयोग करना ही नहीं पड़ता था. लोग करीम के नाम से ही खौफ़ खाते थे. 

करीम लाला ने बंबई पर 40 सालों तक राज किया. 1980 का दशक बंबई में एक और डॉन ‘दाऊद इब्राहिम’ के उदय का समय था. करीम के दोस्त हाजी मस्तान की अंडरवर्ल्ड में सक्रियता कम होने लगी, उधर दाऊद की सक्रियता बढ़ती जा रही थी. 

बंबई में करीम लाला की गैंग का सिक्का चलता था, अगर दाऊद को बंबई पर राज करना था तो करीम को रस्ते से साफ करना बेहद जरूरी था. फिर 1981 की एक रोज बंबई में गैंग वॉर शुरू हो गया और बंबई की गलियां खून से लाल हो गईं. करीम और दाऊद के गुंडों के बीच मुठभेड़ आम हो चुकी थीं.
ये गैंग वॉर पूरे चार साल तक चला, जिसके बाद बंबई को उसका नया डॉन दाऊद मिला. और इस तरह अंडरवर्ल्ड के सरताज़ कहे जाने वाले करीम लाला का दौर ख़तम हुआ.