इतिहास देश

देशद्रोह का आरोप झेल चुके इस वैज्ञानिक पर बन रही है फिल्म

राकेट्री- द नम्बि इफ़ेक्ट, इस फिल्म का निर्देशन अनंत महादेवन और आर.माधवन ने किया है. एक्टर र.माधवन ने बताया कि ये फिल्म मूल रूप से इंग्लिश, हिंदी, तमिल, तेलुगु में बनाई गई है और बाद में इसे मलयालम में भी डब किया जाएगा.

नाम से तो ये आपको कोई रेगुलर साइंस बेस्ड स्टोरी लग रही होगी लेकिन ये फिल्म हर उस वैज्ञानिक को समर्पित है जिसने देश को सशक्त और ताकतवर बनाने में अपना योगदान दिया था. ये फिल्म देश को पहला CRYOGENIC ENGINE देने वाले वैज्ञानिक नम्बी नारायणन को समर्पित है.

नम्बी नारायणन जी पहले उस वक्त ISRO के chairman विक्रम साराभाई के साथ काम करते थे. वो उनके साथ एक payload integrater के तौर पर काम करते थे. उसके बाद नारायणम जी ने सालों तक विदेश में पढ़ाई की…..पढ़ने के बाद उन्हें अमेरिका में ही जॉब ऑफ़र मिला… लेकिन उन्होंने उसको ठुकरा दिया. अपनी योग्यताओं के साथ वो भारत लौट आए.

वापस आकर उन्होंने ISRO के लिए काफी काम किये. उसी दौरान 1992 में रूस से cryogenic fuel based development का contract भारत को मिला….. लेकिन अंतररास्ट्रीय नियमों के कारण इसपर कुछ देशों ने अड़ंगा लगाने की कोशिश की मगर भारत ने इसका तोड़ निकल लिया. नम्बी नारायणन इस cryogenic engine को बनाने में लग गये. वो इस engine को develop करने के काफी करीब थे लेकिन 1994 में झूठे जासूसी कांड के नाम पर केरल की पुलिस ने इनको हिरासत में ले लिया. जिसके बाद उन्हें ढेरों यातनाएं दी गयीं…. उनको मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था. अब ये तो खुल कर नहीं कह सकते कि उस वक्त केरल की CPI सरकार किसके इशारों पर ये सब कर रही थी मगर एक बात तो जरूर सही थी कि…

इस साजिश से नुकसान हुआ था, और ये नुकसान केवल नम्बी नारायणन या उनके परिवार का ही नहीं था बल्कि ये हमारे देश के उज्जवल भविष्य का भी नुकसान था. अगर ये साजिश न की जाती तो भारत इस प्रोजेक्ट में काफी पहले ही कामयाब हो जाता और दुनिया के लिए एक मिसाल बन जाता. लेकिन इसे आप देश का दुर्भाग्य कहे या अपने ही देश में रहने वाले दुश्मनों की ख़ुशनसीबी….. नम्बी के जेल जाने के बाद ये प्रोजेक्ट कभी अपने मुकाम तक पहुंचा ही नही.

वैसे ये इस तरह का पहला या आखरी मामला नहीं था, अगर हम अपने इतिहास को खंगाल के देखे तो हमे ऐसी कई चौंका देने वाली हकीकतों के बारे में पता चलता है. 30 दिसंबर, 1971 को Indian engineering space program के जनक डॉ विक्रम साराभाई की भी उनके पसंदीदा resort में रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गयी थी. इस केस की मुख्य रूप से कोई जाँच नहीं करवाई जाती. ये बात उनकी नजदीकी अमृता शाह से अपनी किताब में लिखी थी कि विक्रम साराभाई को ये पहले से मालूम था कि उनकी जान को खतरा है क्योंकि CIA और KGB दोनों ही उनपर नज़र रखे हुए थे.

देश के खिलाफ हो रही ये साजिशें यही पर ख़त्म नहीं हुई…एक रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ 15 सालों के अंदर ही ISRO ने करीबन अपने 685 विज्ञानिकों को रहस्यमय रूप से खो दिया था…. इस आंकड़े के मुताबिक हर साल ISRO अपने 45 विज्ञानिकों को खो देता था. भाभा एटॉमिक रिसर्च सेण्टर के 2 विज्ञानिकों का शव उनकी ही लैब में जला हुआ बरामद किया गया….ये मौत काफी आश्चर्यजनक थी क्योंकि उनकी लैब में ऐसा कोई पदार्थ ही नहीं था जिससे आग लग सके.

2009 में कैगा एटॉमिकपॉवर स्टेशन के वैज्ञानिक एक सुबह अचानक से गायब हो गये… और फिर 5 दिन बाद उनका शव काली नदी में मिला. आने वाले 4 सालों में एक एक कर ISRO के 11 वैज्ञानिकों की भी कुछ ऐसी ही परिस्थितियों में मौत हो गयी. ये सभी भारत की सबसे पहली Nuclear balistic submarine पर काम कर रहे थे.

इतनी सारी मौतें महज़ इत्तेफाक तो नहीं हो सकतीं…

इन्ही साजिशों में से एक का शिकार नम्बी नारायणन भी थे….. इनपर अब फिल्म बन रही है, इसका बनना ज़रूरी भी था… क्योंकि बेहद जरूरी था उनके जीवन पर प्रकाश डालना. आप में से बहुत कम लोगों ने कुदाम्कुलम नयूक्लेअर पॉवर प्लांट के बारे में सुना होगा. इस प्रोजेक्ट को 1988 में भारत और रूस के बीच sign किया गया था. Soviet Union के टूटने के बाद ये प्रोजेक्ट ठंडा पड़ गया. बाद में सरकार को इसे फिर से शुरू करने का विचार आया…. तब वहां की कुछ ईसाई missionary और NGO’s ने इसका पुरजोर विरोध किया. आसपास के गाँव में जा कर वहां के लोगों को इसके खिलाफ भड़काया…..

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने खुद इस बात को अपने एक बयान में ज़ाहिर किया था. इन NGO’s को बाहरी देशों से फंडिंग मिल रही थी जो ये नहीं चाहते थे कि भारत रूस के साथ मिलकर इस प्रोजेक्ट को अंजाम दे. इसे बर्बाद कर वो दुनिया को ये सन्देश देना चाहते थे कि भारत में निवेश करना सही नहीं रहेगा. हलाकि 2014 के बाद से ऐसे NGO’s पर मोदी सरकार ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया.

भले ही आज सरकार इस बात की पूरी कोशिश कर रही है कि हमारे देश के खिलाफ इस तरह की साजिशें कामयाब ना हो लेकिन अतीत में हो चुकी इन शाजिशों के कारण हमारे देश के कई वैज्ञानिकों ने अपनी जान गंवाई है… जिसकी भरपाई हम चाह कर भी नहीं कर सकते….