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नेटफ्लिक्स की वेब सीरिज लैला की समीक्षा

7 जनवरी 2015, फ़्रांस की एक मशहूर अखबार शार्ली एब्दो के दफ्तर पर एके 47 से लैश बन्दूकधारियों ने इस्लाम समर्थक नारे लगाते हुए हमला कर दिया और 12 लोगों की हत्या कर दी. इसकी वजह थी. शर्ली एब्दो में पैगम्बर मोहम्मद पर एक कार्टून छापा था, जिसे इस्लाम विरोधी माना गया और हमलावरों ने अखबार के दफ्तर पर हमला करते हुए नारा लगाया था – हमने पैगंबर का बदला लिया है अल्लाहु अकबर. उसके बाद शर्ली एब्दो ने पैगम्बर के कार्टून छापने से तौबा कर लिया. क्योंकि उसे पता था कि वो ऐसे कट्टरपंथियों से टकरा रही है जो धर्म के नाम पर कुछ भी कर गुजरने से नहीं हिचकेंगे. ये वही धर्म है जिसे मानने वाले कभी अल कायदा तो कभी ISIS के रूप में दुनिया पर कहर बरपाता रहा है. फिर इससे टकराने की हिम्मत कौन करेगा?

चाहे फ़्रांस हो या भारत. इनके खिलाफ कुछ लिखने, कार्टून बनाने, फिल्म बनाने की हिम्मत किसी में नहीं है. क्योंकि सबको अपनी जान प्यारी है. ये सब मैं आपको यूँ ही नहीं बता रहा. इसके जिक्र की एक वजह है. ऑनलाइन एंटरटेनमेंट प्लेटफोर्म नेटफ्लिक्स इन दिनों एक नया वेब सीरिज ले कर आया है लैला. नाम सुनने से ये एक रोमांटिक वेब सीरिज लगता है. लेकिन आप इसके नाम पर मत जाइए… नाम से ये भले रोमांटिक हो लेकिन इसके अन्दर जहर भरा हुआ है. एक ऐसा ज़हर जिसका मुख्य उद्धेश्य है भारत और हिन्दुओं की छवि को धूमिल करना है.

अब किसी में हिम्मत नहीं कि किसी और धर्म पर कुछ भी उलूल जुलूल बना कर दिखा दें तो भारत के लिबरल, सेक्युलर और वामपंथियों की तरह नेटफ्लिक्स को भी हिन्दू धर्म और भारत को निशाना बनाना सबसे आसान लगा. ऐसा नहीं है कि हमेशा से ऐसा था … साल 2014 के बाद हिन्दुओं को आततायी और भारत को असुरक्षित बना कर दुनिया को पेश करने की एक मुहीम शुरू हुई. लैला उसी मुहीम का एक्सटेंशन है. इससे पहले नेटफ्लिक्स सेक्रेड गेम्स और गोहुल बना चूका है.

अब आते हैं लैला की कहानी पर. लैला की कहानी है 2047 की, यानी कि भारत की आज़ादी के 100 साल पुरे हो जाने के बाद की. 2047 में भारत का नाम आर्यावर्त हो गया है. आर्यावर्त के नेता हैं जोशी जी. आर्यावर्त में टीवी पर जोशी जी आते हैं. फोन में जोशी जी आते हैं, बच्चों की किताबों में जोशी जी की बातें है, बच्चे जोशी जी के कॉमिक्स पढ़ते हैं, घरों की दीवारों पर जोशी जी की तस्वीरें हैं, शहरों में मूर्तियाँ भी जोशी जी की है, मतलब कि जो है वो सब जोशी जी हैं. जैसा एक वामपंथी तानाशाह या फिर एक इस्लामिक तानाशाह होता है वैसा ही कुछ यहाँ जोशी नाम के शख्स को दिखाया गया है, जो अपने नियम और कायदे से आर्यावर्त को चलाता है .

इस आर्यावर्त में दो दुनिया है. एक दुनिया में सब कुछ व्यवस्थित है, लोगों के पास अथाह पैसे हैं. उनके पीने के लिए साफ़ पानी है. आलिशान इमारतें हैं जबकि दूसरी दुनिया में बेतहाशा गरीबी, कंगाली, कूड़े के ढ़ेर, गंदा पानी और मौत के बीच जीने कि जद्दोजहद है. दोनों दुनिया के बीच में है एक दीवार. इस आर्यावर्त में अपने जाती –धर्म के अलावा दुसरे धर्म में शादी करना, प्यार करना गुनाह है. ऐसा करने वाली औरतों को दूष यानी दूषित कहा जाता है और उनकी शुद्धि के लिए शुद्धि केंद्र बने हुए हैं. शुद्धि केंद्र में जबरदस्ती उन्हें रखा जाता है और शुद्धिकरण के नाम पर उनपर कई ज्यादतियां की जाती है. ठीक वैसे ही जैसे इस्लाम में महिलाओं के लिए हलाला एक प्रथा है कुछ वैसी ही प्रथा आर्यावर्त के शुद्धि केंद्र में दिखाया गया है.

हुमा कुरैशी शालिनी के किरदार में जो मुस्लिम से शादी करती है और एक बेटी होती है लैला. लेकिन जोशी के आदमी शालिनी के पति को मार देते हैं और शालिनी को शुद्धि केंद्र में भेज दिया जाता है. उसकी बेटी को भी छीन लिया जाता है. शो की बाकी कहानी में शालिनी , लैला को ढूंढते हुए बिताती है.

मशहूर अखबार द टेलीग्राफ लैला की तारीफ़ में लिखता है – लैला की दुनिया ही हमारे समय का सच है. नहीं डियर टेलीग्राफ, लैला की दुनिया हमारे समय का सच नहीं है. आर्यावर्त भारत का प्राचीन नाम रहा है . धर्मग्रंथों में भी आर्यावर्त के गौरव का जिक्र है लेकिन उस आर्यावर्त को नेटफ्लिक्स में एक वहशी और बर्बाद दुनिया बना कर पेश किया. जोशी जी जैसा चरित्र हमारे समय की सच्चाई नहीं है. ये सच्चाई है ईराक और उत्तर कोरिया जैसे देशों की जहाँ सद्दाम हुसैन और किम जोंग जैसे चरित्र पनपते हैं और घरों की दीवारों से लेकर शहर के चौक पर उनकी मूर्तियाँ लगाईं जाती है. लेकिन आपकी हिम्मत नहीं उस सच्चाई को दिखाने की तो आपने हिन्दू और भारत को निशाना बना लिया.

हमारे देश में महिलाओं को शुद्धि केंद्र नहीं भेजा जाता लेकिन इस्लाम में हलाला जैसी प्रथा है. लेकिन नेटफ्लिक्स में हिम्मत नहीं उस प्रथा पर बात करने की इसलिए उसने लैला के जरिये भारत और हिन्दुओं को निशाना बनाया. शो में सब कुछ बुरा ही बुरा और नर्क ही नर्क है. लेकिन वो नर्क हमारा देश नहीं है. खाड़ी का कोई इस्लामिक देश हूँ सकता है लेकिन नेटफ्लिक्स की हिम्मत नहीं उसे दिखाने की तो आर्यावर्त को दिखा दिया.

पिछले 6 सालों से जिस इन्टॉलरेंस का जिक्र कर देश को खतरनाक बताया जा रहा था और डर का माहौल बनाया जा रहा था, लैला उसी प्रोपैगैंडा का एक्सटेंशन है. जरा सोचिये अगर इसकी कहानी उलट होती. हिन्दू युवक से प्यार करने पर उस युवक को ऐसे ही मार डाला जाता है दिल्ली की सड़कों पर अंकित सक्सेना को मारा गया था. अगर फिल्म को हिरोइन को शुद्धि केंद्र भेजने की बजाये हलाला करते दिखाया जाता तो अब अब तक सैकड़ों फतवे निकल चुके होते और शायद सर वर काटने की भी घोषणा कर दी जाती. लेकिन जान सबको प्यारी है इसलिए आओ और हिन्दुओं को निशाना बनाओ क्योंकि लाख असहिष्णुता के आरोपों के बाद भी हिन्दू ही सबसे सहिष्णु है.