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नहीं होता भारत तो नहीं मिलते Israel के भी नामों-निशाँ

भारतवर्ष के इतिहास से जुड़े कई ऐसे किस्से हैं जिन्हें हमने ना कभी पढ़ा है और ना ही सुना है. शायद हमारे इतिहासकारों को भारतीय योद्धाओं की गौरान्वित महसूस कराने वाली अकल्पनीय विजय गाथाएँ इतिहास के पन्नो में दर्ज हो,, ये बात माज़ूर ना थी. शायद इसीलिए ये किस्से अनकहे ही रह गए.

आज एक कहानी इजराइल में लड़े उन भारतीय रणबांकुरों के नाम, जिन्होंने एक दूसरे देश के अस्तित्व को बचाने के लिए अपने प्राणों की बाली देदी.

एक ऐसी लड़ाई जो तोप या बंदूकों के इस्तेमाल किए बिना ही लड़ी गयी,,,, जबकि सामने थी तुर्की, ऑस्ट्रिया और जर्मनी की संयुक्त की शक्तिशाली सेना जो कि सारे आधुनिकता संसाधनों से लिप्त थी.

इजराइल का इतिहास इसे हाइफा युद्ध के नाम से याद करता है. जिस जंग में 1000 भारतीय सैनिकों ने अपनी जान की आहूति दी थी.

हाइफा की लड़ाई मानव इतिहास का सबसे बड़ा और अपनी तरह का आखिरी लड़ाई मानी जाती है. इसीलिए उन भारतीय योद्धाओं के पराक्रम और साहस से जुड़े इन पन्नो को दुबारा खोलना बेहद जरूरी है.

तो चलिए चलें इतिहास में… और जानें आखिर इस लड़ाई में हुआ क्या था…… वो साल था 1918

पहला विश्वयुद्ध खत्म तो होगया था पर उस जंग की आग की तपन अभी तक थमी नही थी. उस युद्ध के बाद कोई भी देश किसी और पर विश्वास करने की बात से ही घबराता था. जंग खत्म होने के बाद भी माहौल सुधरने का नाम नहीं ले रहे थे.

उस वक्त फिलिस्तीन से सटे समुद्र के किनारे पर बसे शहर हाइफा पर जर्मन और तुर्की ने कब्जा कर रखा था. हाइफा कोई मामूली शहर नहीं था, अपने समय मे वो रणनीतिक तौर पर सबसे महत्वपूर्ण जगहों में से एक था,साथ ही बंदरगाह होने के कारण वो युद्ध के लिए समान आयात करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था. इस लिए उसको वापस से हासिल करना इजराइल के लिए बेहद जरूरी था.

इस जंग को अंजाम देना आसान नहीं था क्योंकि दुश्मन ज्यादा ताकतवर था.

यहां तुर्की, जर्मनी और ऑस्ट्रिया सभी की सैन्य चौकियां मौजूद थी. उनके पास उस वक्त युद्ध मे इस्तेमाल होने वाले सभी आधुनिक उपकरण मौजूद थे.

ये बात तो आपको यकीनन मालूम होगी कि ब्रिटिश साम्राज्य चंद पैसों में ही भारतीय मूल के सैनिकों को भरती करता था और बाहरी देशों में कर अपने निज़ी हितों की लड़ाइयों में कुर्बान होने के लिए छोड़ देता था.

ऐसे ही हाइफा को तुर्की सेना से मुक्त करवाने की जिम्मेदारी ब्रिटिश सेना ने तो ली थी मगर इसका असली ज़िम्मा भारतीयों के कंधों पर था. उस वक्त भारत की 3 रियासतों मैसूर, जोधपुर और हैदराबाद से ब्रिटिश सरकार ने सहियोग की अपील की और देखते ही देखते 150,000 सैनिकों को जंग के लिए भेज दिया गया.

हैदराबाद रियासत के सैनिक मुस्लिम थे, इसलिए अंग्रेजों को इस बात का डर था कि कहीं वो उसके साथ ना मिल जाए. इस डर से उन्होंने निजाम के सैनिकों को सिर्फ देखरेख का ही काम सौंपा. वहीं मैसूर और जोधपुर की सैन्य टुकडिय़ों को मिलाकर एक विशेष इकाई बनाई गई थी.

भले ही सेना के पास झंडा ब्रिटैन का था मगर वो सैनिक भारत के थे. उनके अंदर जो जज्बा था वह भारतीय था. उन्हों ये बात तो कभी मालूम ही नहीं थी कि ये जंग क्यों हो रही है या इससे ब्रिटिश हुकूमत को क्या फायदा होने वाला है.वो तो बस हाइफा के लोगों को गुलामी से रिहा करवाना चाहते थे इस उम्मीद में कि कभी उन्हें भी ये आज़ादी नसीब होगी.

लड़ाई का आगाज़ हो चला, भारतीय सैनिक घोड़े पर सवार थे. उनके पास लड़ने के लिए महज़ भाले और तलवारें थीं. अंग्रेज़ों ने पैदल चलने वाले चंद सैनिकों को बंदूकें थमा दीं थी. मगर हाइफा में मौजूद तुर्की सेना से लड़ने के लिए क्या ये काफ़ी था? शायद नहीं

अंग्रेजों ने भारतीय सैनिकों को माउंट कार्मेल पर तैनात तुर्की तोपखाने को तहस-नहस करना का लक्ष्य दिया था. जोधपुर लांसर्स ने अपने सेनापति मेजर ठाकुर दलपत सिंह शेखावत के नेतृत्व में सबसे पहले शहर में कदम रखा. जिसके बाद पूरी सेना ने हाइफा पर धावा बोल दिया. वहीं तुर्की सैनिक इस बात से बिल्कुल बेखरब थे. जबतक वो इस अचानक हुए इस हमले से सावधान हो पाते, भारतीय सैनिकों ने बंदूकों से गोलियां बरसाना शुरू कर दिया.

जोधपुर के सैनिक माउंट कार्मेल पर हमले को तैयार थे वहीं मैसूर के सैनिकों ने पर्वत के उत्तरी तरफ से हमले कर रहे थे. अब भारतीय सैनिक तुर्की सैनिकों को मौत के घाट उतार रहे थे.

तभी खबर आई कि कमांडर कर्नल ठाकुर दलपत सिंह शहीद होगये हैं. इसके बाद उनके डिप्टी बहादुर अमन सिंह जोधा ने मोर्चा संभाला लेकिन उस वक्त तक तुर्की सेना भी संभाल चुकी थी. अब तुर्की सेना धीरे धीरे लड़ाई में अपनी पकड़ मज़बू करने लग गई थी. ये देख अंग्रेजी सैनिक पीछे हट गए. पीछे हटने का मौका भारतीय सैनिकों के पास भी था, मगर उनकी अंतरआत्मा को ये मंजूर नहीं था. देश के सम्मान के आगे जान की बाज़ी बेहद छोटी चीज़ थी. वो लड़ते रहे, और उस युद्ध मे विजय प्राप्त की जिसे जीतने के सपना ब्रिटिश के लड़ाई शुरू होते है छोड़ दिया था. इस तरह एक ही दिन में इजराइल को 400 साल पुराने ऑटोमन साम्राज्य के चंगुल से भारतीय सेना ने आज़ादी दिलाई.

इस लड़ाई में लगभग 1000 भारतीय सैनिकों ने अपनी जान कुर्बान कर दी थी. दूसरी ओर भारतीय वीरों ने जर्मन- तुर्की सेना के 700 सैनिकों को बंदी बना लिया था.

हाइफा, यरुशलम, रामलेह और ख्यात बीच सहित इजराइल के सात शहरों में इस युद्ध से जुड़े कई अवशेष आज भी सही सलामत मौजूद हैं.

हैरानी की बात तो ये है कि आज भी इजराइल इस बात को याद रखकर हर साल 23 सितंबर को ‘हाइफा दिवस‘ मनाया जाता है. वहां के स्कूलों में हाइफा युद्ध और भारतीय सैनिकों के शौर्य की गाथा पढ़ाई जाती है.

हाइफा भारत के सैनिकों की लड़ी गई एक ऐसी लड़ाई थी जिसे आज शायद ही दुनिया वाले जानते हैं. जहां एक तरह इजराइल जैसा देश आज भी इस घटना को याद कर उन वीर जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित करता है वहीं दूसरी तरफ हम उन्होंने याद करना तो दूर इस घटना तक के बारे में नहीं जानते हैं.

ये लड़ाई सिर्फ यही संतुष्टि दे जाती है कि भारतीय सैनिकों ने हाइफा के लोगों को तुर्क शाशकों से आज़ाद कराया साथ ही पूरी दुनिया को दिखा दिया कि आखिर भारत के सैनिक कितने शूरवीर होते हैं.