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कबीर सिंह से क्यों नाराज है फेमिनिस्ट?

शाहिद कपूर की फिल्म कबीर सिंह रिलीज हो गई . दर्शकों को फिल्म बहुत पसंद आ रही है और फिल्म बॉक्स ऑफिस पर खूब पैसे बटोर रही है. फिल्म के रिलीज होने के बाद से ही कई रिव्यू पढने को मिले. कुछ  समीक्षकों ने फिल्म के स्क्रीनप्ले, डायरेक्शन, शाहिद की एक्टिंग, बैकग्राउंड स्कोर की जमकर तारीफ़ की. लेकिन एक वर्ग ऐसा भी है जिसे इस फिल्म में कुछ समझ नहीं आया सिर्फ इस बात के कि ये फिल्म महिला विरोधी है. ये वर्ग देश का फेमिनिस्ट गैंग है. फेमिनिस्ट गैंग वो होता है जिन्हें सिर्फ एक काम होता है खाली बैठ कर हर चीज में मीन मेख निकालना. हर चीज में महिला एंगल निकालना और उसे महिला विरोधी घोषित कर देना. करवाचौथ, मंगलसूत्र, रक्षाबंधन, सिन्दूर … ये सब उन्हें महिला विरोधी लगती है. अब आज कल इन फेमिनिस्टो ने नया शगल पाल लिया है. फिल्मों को महिला विरोधी घोषित करना.

कबीर सिंह में एक सीन है – जिसमे कबीर का दोस्त शिवा कहता है कि कबीर को शिवा की बहन से शादी कर सेटल हो जाना चाहिए. ये सीन फेमिनिस्टो को बहुत बुरी लग गई. एक फेमिनिस्ट बहन ने द हिन्दू में फिल्म की समीक्षा करते हुए इस फिल्म को महिला विरोधी घोषित कर दिया और इस बात पर सख्त आपत्ति जताई कि शिव होता कौन है अपनी बहन के लिए डिसीजन लेने वाला? क्या शिव के बहन की अपनी कोई इच्छा नहीं है. अरे बहन फिल्म है तो फिल्म की तरह देखो ना, इतना भावुक क्यों हो रही हो?

फिल्म का एक और सीन है जिसमे कबीर, प्रीती को थप्पड़ मारता है. कबीर ने एक थप्पड़ मारा तो फेमिनिस्टो को बुरा लग गया. थप्पड़ कैसे मार दिया लड़की को?  लेकिन फिल्म के क्लाइमेक्स में प्रीती, कबीर को 5 थप्पड़ मारती है तो वो OK है .. वो वीमेन इम्पावरमेंट है.

एक और आरोप है कि कबीर महिलाओं की इज्जत नहीं करता. कबीर तो पुरुषों की भी इज्जत नहीं करता तो फिर फिल्म को पुरुष विरोधी क्यों घोषित नहीं किया ? सिर्फ महिला विरोधी ही क्यों घोषित किया ?

कबीर लड़कियों को ऑब्जेक्टीफाई करता है … तो क्या लड़कियां लड़कों को ऑब्जेक्टीफाई नहीं करती ? डियर फेमिनिस्ट बहन, अगर याद ना आ रहा हो तो याद दिला दूँ कि ज्यादा दिन नहीं हुए जब वीरे दी वेडिंग रिलीज हुई थी. उसमे भी तो चार लड़कियां , लड़कों को ताड़ती है .. तब तो उस फिल्म को पुरुष विरोधी घोषित नहीं किया. कबीर अगर अपनी पैंट में बर्फ डालता है तो वो womaniser हो गया और वीरे दी वेडिंग में जब स्वरा भास्कर मास्टरबेट करती है तो वो वीमेन इमपॉवरमेंट हो गया . इतना दोहरा चरित्र लाती कहाँ से हैं ये फेमिनिस्ट? शायद फेमिनिस्ट गैंग को इसलिए भी ये फिल्म महिला विरोधी लग रही है क्योंकि इसमें जो हिरोइन है वो अपने ब्रा के स्ट्रिप नहीं दिखाती, मुंह से गालियाँ नहीं निकालती, ओर्गेस्म इक्वलिटी की बात नहीं करती, नशा नहीं करती, दर्जन भर लड़कों के साथ सोती नहीं …. बल्कि सिर्फ एक लड़के के लिए कमिटेड है.

अब डायरेक्टर्स को फिल्म के शुरुआत में ही चेतावनी चलानी चाहिए कि – अल्ट्रा फेमिनिस्ट इस फिल्म से दूर रहे, वरना हाई बीपी, लो बीपी की शिकायत हो सकती है. इन फेमिनिस्टो का एक ही सिद्धांत है. महिलाएं करें तो रासलीला, पुरुष करें तो साला कैरेक्टर ढीला है.