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कांग्रेस शासित भारत के कुछ अनसुलझे रहस्य

2019 में एक बार फिर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार बनने जा रही है. कई लोगों के लिए ये बेहद ख़ुशी की बात है तो कई लोगों के लिए गम की वज़ह भी….आपने मोदी सरकार के कार्यकाल का analysis करने वाले ढेरों आर्टिकल पढ़े होंगे लेकिन क्या कभी किसी ने पीछे मुड़ कर कांग्रेस के इतिहास को खंगालने की कोशिश की ??? शयद नहीं. आज हम कांग्रेस राज के उन पहलुओं को आपके सामने रखने की कोशिश करंगे जो शयद आप भूल चुके हैं.

देश में पिछले कई दशकों से नकारात्मता का माहौल बना हुआ था. आये दिन अख़बारों और टीवी चैनलों पर एक न एक नए घोटाले और भ्रष्टाचार की ख़बरें सुनने को मिलती थी. दरअसल आज़ादी के बाद से ही हमारे देश में हमारे ही लोगों के खिलाफ़ अंदर ही अन्दर तमाम साजिशें पनपती रही हैं. जिन्हें उजागर करने की हिम्मत इस देश के मीडिया संस्थानों ने नहीं दिखाई है….राजनीतिक चाटुकारिता और बॉलीवुड गोसिप के इन्हें कभी फुर्सत ही नहीं मिली जो ये सरकार की अनदेखियों पर आवाज़ उठाते. आज हम ऐसे ही कुछ सवाल आपके सामने लेकर आये हैं जो पूछे तो बहुत पहले ही जाने चाहिए थे, लेकिन पूछे नहीं गए. ये सवाल भले ही गुज़रे हुए वक्त की बातें हो चले हैं लेकिन इन्ही गुज़रे हुए वक़्त के सवालों में काफ़ी रहस्य भी छुपे हुए मिल जाते हैं.

शायद कम ही लोगों को मालूम होगा कि सुभाष चंद्र बोस की मौत के करीबन 20 साल बाद तक उनके परिवार और रिश्तेदारों की जासूसी की गयी थी. लेकिन ये जासूसी क्यों की गयी ये किसी को नहीं पता. और इस जासूसी से हासिल क्या हुआ ये बात भी छुपी रही.

श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीन दयाल उपाध्याय और लाल बहादुर शास्त्री जैसे बड़े नेताओं की मृत्यु का कारण सरकार आजतक पता नहीं करवा सकी है. पता लगवाना तो फिर भी दूर की बात है, इनकी मौत का कारण जानने के लिए जाँच बैठना तक तो तत्कालीन सरकारों ने मुनासिब नहीं समझा.

अगर हम गौर करें तो पता चलता है कि देश में पिछले 60 सालों के दौरान अनगिनत विज्ञानिकों की रहस्यमय रूप से मौत हुई. डॉ होमी भाभा से ले कर के. के. जोशी जैसे कई nuclear program विज्ञानिकों ने रहस्मय परिस्थितियों में अपनी जान गंवाई है. लेकिन इनकी मृत्यु के पीछे की असल वजह जानने और उनके गुनाहगारों को पकड़ने का प्रयास सालों तक किसी भी सरकार ने नहीं किया?

एक और ऐसा ही किस्सा है जो इतिहास के पन्नों से हटा दिया गया था. 1966 में इंदिरा गाँधी ने गोपाष्टमी के दिन अनगिनत साधुओं पर अंधाधुंध गोलियां चलवा दीं थी, वो भी तब जब वो गौ मांस पर प्रतिबंध लगाने के लिए सरकार से गुहार लगा रहे थे. एक रिपोर्ट के मुताबिक इस हादसे में 5000 से भी ज्यादा साधुओं की मौत हो गई थी. उस वक्त की इंदिरा सरकार ने पत्रकारों को मृतकों की कोई भी जानकारी नहीं लेने दी थी. यही वज़ह है जिसके कारण आज इस देश में शायद ही इस नरसंघार के बारे में कोई जनता हो.

1971 में राज नारायण ने इंदिरा गाँधी के खिलाफ चुनाव लड़ा था. उस चुनाव में जीत तो इंदिरा की ही हुई थी मगर राज नारायण ने इंदिरा पर ये आरोप लगाया था कि उन्होंने मतदाताओं को खरीद कर जीत हासिल की है. जब ये मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा तब जज ने न सिर्फ इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला सुनाया बल्कि उनके चुनाव लड़ने पर 6 साल का प्रतिबन्ध भी लगा दिया था. मामले को सुप्रीमकोर्ट ले जाया गया, लेकिन वहाँ से भी हार मिलने के बाद ही इंदिरा गाँधी ने 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लगवा दिया. उस रात से ही सारे बड़े मीडिया संस्थानों की बिजली काट दी गयी थी. एक एक कर विरोधी पक्ष के नेताओं को अरेस्ट करना शुरू कर दिया गया था. उनमे कई बड़े नेता जैसे जयप्रकाश नारायण, राज नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण अडवाणी शामिल थे. उस दौरान देश में न केवल ज़बरन नसबंदी करवाई गयी थी बल्कि जनता पर तमाम जुल्म भी किये गये थे.


सरकार के द्वारा 1984 में किये गये सिख नरसंहार की धूमिल यादें आज भी लोगों के ज़हन में दबी पड़ी हैं. ना जाने कितनी मौतें हुई, कितने लोग बेघर हो गये, और कितने ही बच्चों ने अपने सर से माँ बाप का साया खो दिया था, लेकिन सरकार की तरफ से पछतावे की जगह कुछ ऐसा बयान सुनने को मिला,
‘जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती तो हिलती ही है’
क्या मीडिया को सरकार का ये रवैया असंवेदनशील नहीं लगा? क्या इसपर सवाल नहीं खड़े किये जाने चाहिए थे?

1990 में तो कश्मीर से कश्मीरी पंडितों की जड़े ही उखाड़ फेंकी गयीं. 20 सालों तक वो लोग सरकारों से गुहार लगते रहे लेकिन सुनता कौन. 2014 में जा कर इस मुद्दे को रोशनी में लाया गया.
70 से 80 के दशक में हमारा देश CIA और KGV के लिए प्ले ग्राउंड बन गया था. 2004 से लेकर 2013 तक हमारे देश में बहुत से बम ब्लास्ट हुए जिनमे पाकिस्तान के कुछ कट्टर संगठन और खूफ़िया एजेंसी ISI शामिल रहते थे. उसी दौरान 100 से ज्यादा नक्सली हमले भी हुए थे. जिसके बाद इन हमलों को हिंदुत्व से जोड़ कर एक फर्जी कहानी को जन्म दिया गया. 2008 में हुए मुंबई हमले को भी ऐसे ही किसी Narrative से जोड़ने की पूरी तैयारी हो चुकी थी, अजमल कसाब और उसके साथियों की कलाइयों पर कलावा भी बांध दिया गया था. वो तो शयद इस देश की किस्मत अच्छी थी कि कसाब जिंदा पकड़ा गया और असलियत सामने आ गयी. इस हमले से पहले ही ’26/11 RSS की साजिश’ नाम की किताब को लिख कर प्रिंट करवाया जा चुका था. इस बात की पुष्टि पूर्व RAW अधिकारी RSN सिंह ने खुद की थी.

देश के खिलाफ ऐसी ढेरों साजिशें हुई हैं जिनसे देश की प्रगति को आहत पहुंचाई है.