इतिहास

जाने कौन था वो महान सम्राट जिसने इस देश की सनातन पद्यति का पुनर्निर्माण किया

हमारे देश के प्राचीन इतिहास के कई ऐसे पन्ने हैं जो समय के साथ हमारी आँखों से ओझल हो गये. इस प्रक्रिया में सबसे बड़ा हाथ हमारे देश की स्वतंत्रता के बाद के इतिहासकारों का था, जिन्होंने ना सिर्फ अपने ही देश के गौरवशाली महापुरुषों को भुला दिया बल्कि विदेशी आक्रमणकारियों और क्रूर शाशकों के महिमामंडन में कोई कमी नहीं छोड़ी.

आज हम एक ऐसी शख्सियत के बारे में बात करने वाले हैं जिनके बारे में शायद ही आपने कभी अपनी स्कूली किताबों में पढ़ा या सुना हो.

हम सभी ये बात जानते हैं कि मगध साम्राज्य के सम्राट धनानन्द के साथ नन्द वंश का पतन और मगध सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के साथ मौर्य साम्राज्य के उदय का श्रेय भारत वर्ष के सबसे माहान आचार्य “ चाणक्य ” को जाता है.

उस वक्त के सबसे बड़े विद्यवन चाणक्य ने अपने जीवित रहने तक विश्व की प्राचीनतम हिंदू धर्म और उसकी वैदिक पद्ति को निभाते हुए मगध की धरती को बौद्ध धर्म के प्रभाव से बचा कर रखा था.

इतिहास गवाह है कि सम्राट चन्द्रगुप्त के शासन काल में मगध साम्राज्य की सीमा उत्तरी भारत तक ही थी. लेकिन चंद्रगुप्त मौर्य अपने अंतिम दिनों में जैन धर्म को अपनाकर, राजपाट त्याग चुके थे, तब बिन्दुसार ने मॉयर साम्राज्य की गद्दी संभाली बिन्दुसार ने दक्षिण भारत के ऊचांई वाले क्षेत्रों पर विजय हासिल की.

लेकिन बाद में अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद बौद्ध धर्म को अपना कर लगभग 20 वर्षों तक एक बौद्ध सम्राट के रूप में मगध पर शासन किया. अशोक ने अपने पूरे शासन तंत्र को बौद्ध धर्म के प्रचार व प्रसार में लगा दिया नतीज़ा ये की इसका साम्राज्य पर दुष्प्रभाव पड़ा और मौर्य वंश के नौवें सम्राट वृहद्रथ के साथ मौर्य वंश का अंत हुआ.

लेकिन जब पुष्यमित्र शुंग ने शुंग राजवंश की स्थापना की तब सम्राट पुष्यमित्र ने एक सुगठित सेना का गठन किया और दक्षिण भारत स्थित विदर्भ को तो जीत ही साथ साथ यूनानियों को भी परास्त कर अपने अखंड साम्राज्य का विस्तार किया.

आप कल्पना करिये सम्राट पुष्यमित्र का साम्राज्य उत्तर में हिंदुकुश से लेकर दक्षिण में नर्मदा के तट तक तथा पूर्व में मगध से लेकर पश्‍चिम में पंजाब तक फ़ैल चुका था वो भी महज़ कुछ सालों में. भगवान रामचंद्र की धरती अयोध्या से, सम्राट पुष्यमित्र शुंग संबंधी प्राप्त शिलालेख जिसमें उसे “ द्विरश्वमेधयाजी “ कहा गया है, जिससे प्रतीत होता है की उसने दो बार अश्वमेध यज्ञ किए थे.

पतंजलि अपनी रचना “ महाभाष्य “ में लिखा है “ इह पुष्यमित्रं याजयामः “, मुनि पतंजलि ने यहाँ दर्शाया है की वह पुष्यमित्र शुंग के पुरोहित हैं एवं यज्ञ उनके द्वारा कराया गया है.

आज के दौर शायद किसी को ये मालूम है कि सम्राट पुष्यमित्र ने  यूनानियों के आक्रमण करने पर ना सिर्फ उन्हें युद्ध मे करारी शिकस्त दी बल्कि साथ युद्ध जीत कर यूनानी सैनिकों को सिन्धु नदी के पार धकेल दिया था. सम्राट पुष्यमित्र ने आर्यावर्त की धरती को बार बार ग्रीक शासकों के आक्रमण से बचाया था.

विदेशी आक्रमणकारियों का हमारे देश पर हमला करने का इतिहास काफी पुराना है. लेकिन पुष्यमित्र जैसे माहान सम्राटों ने इस देश को इस किसिम के हमले से काफी समय पहले भी बचा कर रखा.

इसके बाद आर्यावर्त के इतिहास में ग्रीक शासकों के आक्रमण का कोई भी जिक्र नहीं मिलता है. सम्राट पुष्यमित्र ने देश में शान्ति और व्यवस्था की स्थापना कर मौर्य शासन काल में बौद्ध धर्म के प्रचार व प्रसार के कारण ह्रास हुए वैदिक सभ्यता को बढ़ावा दिया.

मौर्य शासन काल में जिन्होंने डर के कारण बौद्ध धर्म को अपना लिया था वे वापस से वैदिक धर्म की ओर लौट चले. मगध सम्राट पुष्यमित्र शुंग की राह पर चलते हुए उज्जैन के महान सम्राट विक्रमादित्य और गुप्त साम्राज्य के शासकों ने भी वैदिक धर्म के ज्ञान को पूरे विश्व में फैलाया. इस देश मे सनातन संस्कृति को बचाए रखने में शुंग साम्राज्य ने अपनी बड़ी भूमिका निभाई है. यही वजह थी कि उन्हें वैदिक पुनर्जागरण का काल भी कहा जाता है.

इसी काल में संस्कृत भाषा को पूर्णजाग्रत किया गया था. साथ ही मनुस्मृति के वर्तमान स्वरुप की रचना भी इसी युग में हुई थी. सम्राट पुष्यमित्र शुंग का शासन काल कुल 36 वर्षों का रहा है. इन वर्षों में सुंग ने भारत का बिगड़ता स्वरूप ही बदल दिया था. अफसोस कि बात यहां ये है कि इतिहास के इस महत्वपूर्ण अध्याय को हमारे इतिहासकारों के भुला दिया. ये सोचने वाली बर्फ है कि अपने ही देश के लोगों को उनके गौरवशाली इतिहास से ओझल क्यों रखा जा रहा है.